Posts Tagged ‘दिल’

नम हैं आज तक यादों के सूखे पत्ते

मुझे क्या हुआ है मुझे कुछ पता नहीं है
क्या मेरे दर्दो-ग़म की कोई दवा नहीं है
यह उदासियों की शामें बहुत उदास हैं
मेरे नसीब में क्या मौसमे-वज़ा1 नहीं है
आफ़त यह हम पर टूटकर आयी है
इसे देखने को क्या कोई ख़ुदा नहीं है
सब आश्ना आज ना’आश्ना2 बन गये हैं
ऐ तीरगी3! मेरा कोई रहनुमा4 नहीं है
दिलचस्पियाँ जीने में [...]

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वह जब भी इस गली इस डगर आये

वह जब भी इस गली इस डगर आये
मेरी ज़िन्दगी की सहर1 बनकर आये
शबो-रोज़2 जलता हूँ मैं इन अंधेरों में
वह मेरे लिए कुछ रोशनी लेकर आये
आया था पिछली बार अजनबी बनकर
अब कि बार वह मेरा बनकर आये
हूँ बहुत दिनों से शाम की तरह तन्हा
कोई मंज़र-ए-सोहबत3 नज़र आये
दरवाज़े पे खड़ा हूँ इक यही आस लिये
वह मेरी बे-सदा4 [...]

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नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही
मुझको मोहब्बत है’ तुम से ही
नाज़ है तुम्हें’ थोड़ा ग़ुरूर मुझे
मैंने दिल लगाया है’ तुम से ही
आज न पिघला तो कल पिघलेगा
यह बात हम सुनेंगे’ तुम से ही
आज दूरियाँ हैं तेरे-मेरे बीच
ज़रूर कल मिलेंगे’ तुम से ही
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

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हुआ है आज उनका फ़ैसला मेरे ख़िलाफ़

हुआ है आज उनका फ़ैसला मेरे ख़िलाफ़
सुनने में आया है न करेंगे मुझे मुआफ़
उस ने एक भी मौक़ा न दिया मुझ को
जो उनसे मिलके करते अपना दिल साफ़
आये तो मौत आये उनके सामने सुकूँ से
देखें वह रूह से छुटता हुआ मेरा लिहाफ़
ढल रही थी धीरे-धीरे सहर में यह रात
पड़ रहा धीरे-धीरे मेरे दिल में शिगाफ़
शब्दार्थ:
मुआफ़: [...]

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वह मुस्कुराया और रूठा भी

वह मुस्कुराया और रूठा भी
वह सच्चा है और झूठा भी
दूर था तो क़रीब था दिल के
उसकी बात से दिल टूटा भी
इक ख़ाब माना हमने जिसको
वह छाला बनकर फूटा भी
जिस कशिश पे हम मर बैठे
उस कशिश ने दिल लूटा भी
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

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