Posts Tagged ‘इश्क़’

नम हैं आज तक यादों के सूखे पत्ते

मुझे क्या हुआ है मुझे कुछ पता नहीं है
क्या मेरे दर्दो-ग़म की कोई दवा नहीं है
यह उदासियों की शामें बहुत उदास हैं
मेरे नसीब में क्या मौसमे-वज़ा1 नहीं है
आफ़त यह हम पर टूटकर आयी है
इसे देखने को क्या कोई ख़ुदा नहीं है
सब आश्ना आज ना’आश्ना2 बन गये हैं
ऐ तीरगी3! मेरा कोई रहनुमा4 नहीं है
दिलचस्पियाँ जीने में [...]

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जो इश्क़ की आग भड़क उठी है

जो इश्क़ की आग भड़क उठी है
जैसे मैं शोलों में जल रहा हूँ
तेरे बदन की कशिश का है जादू
देखकर तुझ को मचल रहा हूँ
मुझे है ख़ाहिशो-तमन्ना1 तेरी
मैं उम्मीद को मसल रहा हूँ
एक यह ख़ाब मैं देखता हूँ कि
तेरी मरमरीं बाँहों में पिघल रहा हूँ
शब्दार्थ:
1. ख़ाहिशो-तमन्ना: इच्छा और चाह
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

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वह मुझको मुआफ़ रखे दुनिया के मामलों से

वह मुझको मुआफ़1 रखे दुनिया के मामलों से
मैं अब कभी किसी और से इश्क़ न करूँगा
दिल मेरा चाहे हो जाये टूटकर टुकड़े-टुकड़े
इस ग़म में आँखों को तर ऐ अश्क! न करूँगा
जो देखा है उस का चेहरा मैंने दो ही रोज़
इस बात का अपने ख़ुदा से रश्क2 न करूँगा
मेरे दिल में है तेरे ख़ाबों का इक [...]

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जो गुज़र गयी सो गुज़र गयी पुरानी बात थी

जो गुज़र गयी सो गुज़र गयी पुरानी बात थी
उन आँखों में छिपी एक उजली रात थी
जब देखा था मंज़रे-हसीन-हुस्न1 मैंने
उस लम्हा चाँद था और सितारों की बरात थी
साहिब हमें दाँव-पेंच नहीं आते इश्क़ में
और वह प्यार की पहली दूसरी हर मात थी
वह शब2 नहीं भूले जब घर आये थे तुम
उफ़! वह निगाह की निगाहों से [...]

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नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही

नहीं आसाँ तो मुश्किल ही सही
मुझको मोहब्बत है’ तुम से ही
नाज़ है तुम्हें’ थोड़ा ग़ुरूर मुझे
मैंने दिल लगाया है’ तुम से ही
आज न पिघला तो कल पिघलेगा
यह बात हम सुनेंगे’ तुम से ही
आज दूरियाँ हैं तेरे-मेरे बीच
ज़रूर कल मिलेंगे’ तुम से ही
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

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