मेरी हर नज़र
मेरी हर नज़र बेक़रार’ और रूह बेताब है,
लबों को भी न तस्लीम एक बूँद आब है
रोज़-रोज़ की मुश्किली, यही वह अज़ाब है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४
मेरी हर नज़र बेक़रार’ और रूह बेताब है,
लबों को भी न तस्लीम एक बूँद आब है
रोज़-रोज़ की मुश्किली, यही वह अज़ाब है
न कोई शिकायत है तुझसे न कोई गिला है
तुम अपने हसीं लबों से हर्फ़ छुओ न छुओ
कम-स-कम बाहम निगाहों में गुफ़्त-गू है!
बाहम= आपस में
ज़ियाँ दिल का किया जो तुमसे लगाया
तो पल-पल सीने में धड़कता क्या है?
तेरी आरज़ू मुझे कहाँ बहा ले जा रही है?
ज़ियाँ = loss
हम में जीतने का हौसला है ‘नज़र’
यह बाज़ी भी हम मारकर जायेंगे
यह ज़ख़्म जाविदाँ नहीं रहने वाले
सिफ़र को टोह लेते हैं दिले-यार में
अपनी भी दीवानगी कुछ कम नहीं
मैं और वह, दोनों कभी दोस्त थे!
सिफ़र= शून्य, zero
दिल का जला होता तब रोशनी होती
मैं तो जला हूँ चश्मे-अश्कबारी का…
अब मेरी ख़ाक इक निहाँ दलदल है!
चश्मे-अश्कबारी= rain of tears, निहाँ= hidden, buried
दलदल= marsh, quagmire, ख़ाक= ash, dust
यक़ीनन तुम्हारे हुस्न पे लाखों मरते होंगे
मगर जो तुम पर मिट गया वह ‘नज़र’ है
मेरी इब्तिदा तुम हो, मेरी इन्तिहाँ तुम हो!
इब्तिदा= beginning, start, इन्तिहाँ= end, zenith