बहुत दिनों बाद

June 26, 2008 at 1:31 pm (कुछ पल बचपन से) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

बहुत दिनों बाद यादों की सुनहरी धूप निकली
मैंने अपना बदन सेंका,
ख़्याल महके जब ज़हन पे जमी बर्फ़ पिघली
मैंने तस्वीरे-आज फेंका…

मालती की बेलें औराक़ पे हर्फ़ों की दीवार से लिपटीं
ख़ुशबू-ए-मिज़ाज रखके यह मेरी आँखों में सिमटीं

रोज़ रात शबनम में भीग जाती हैं सारी ख़ाहिशें जब
उड़ चलती है फ़ाख़्ता-ए-मन पुराने शहर की तरफ़

लफ़्ज़ों की मौज ने ली अँगड़ाई रिश्तों के बदन पे
मानूस चेहरों के चराग़ जल उठे ताक-ए-ज़हन पे

इन दिनों उड़ता फिरा हूँ मैं आँधी की तरह आवारा
लूटने के लिए वो पुराने मौसम पतंगों वाले दोबारा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

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बचपन की ख़ुशबू

December 16, 2007 at 10:17 pm (कुछ पल बचपन से) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

मेरे बचपन की ख़ुशबू मेरे साथ ही चलती है
कभी मेरे ख़ाब में कभी किताब में मिलती है

कभी पतंगों के साथ आसमाँ में उड़ती है
कभी मालती की बेलों में महकती खिलती है

रुचि सोनल जूली नीता बिन्नू संजू पवन प्रीति सोना
जैसे नामों की बिखरी तस्वीर जोड़ते मिलती है

कभी स्कूल में अभय राजीव हर्पित को पूछती है
कभी सआदत गंज की गलियों में टहलती है

फाख़्ता और गौरैया के आशियानों से गुज़रते हुए
मेरे बाएँ पाँव का भँवर सहलाती टटोलती है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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