जो इश्क़ की आग भड़क उठी है
जैसे मैं शोलों में जल रहा हूँ
तेरे बदन की कशिश का है जादू
देखकर तुझ को मचल रहा हूँ
मुझे है ख़ाहिशो-तमन्ना1 तेरी
मैं उम्मीद को मसल रहा हूँ
एक यह ख़ाब मैं देखता हूँ कि
तेरी मरमरीं बाँहों में पिघल रहा हूँ
शब्दार्थ:
1. ख़ाहिशो-तमन्ना: इच्छा और चाह
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४




















Posted by mithilesh dubey on August 13, 2009 at 8:53 PM
भाई वहा क्या बता है। लाजवाब रचना
Posted by Arkjesh on August 12, 2009 at 5:34 PM
इतनी बढ़िया-बढ़िया ग़ज़ल |
आप मेरे ब्लॉग रोल में शामिल आज से |
Posted by अविनाश वाचस्पति on July 19, 2009 at 8:41 AM
इतनी गर्मी पहले ही पड़ रही है
उस पर आगमआग
जागकर जल्दी बंदे
सर्दी की ओर भाग।
Posted by Dilip Kawathekar on July 18, 2009 at 11:03 AM
उम्दा भाव.
Posted by Chandra Mohan Gupta on July 8, 2009 at 7:29 PM
अहसासे-प्यार का प्यारा सा अहसास दिलाती आपकी रचना अच्छी लगी, बधाई स्वीकार करें.
चन्द्र मोहन गुप्त
Posted by अशोक पाण्डेय on July 5, 2009 at 7:26 PM
बहुत खूब। बहुत सुंदर रचना।
Posted by murari lal pareek on June 28, 2009 at 7:10 PM
आपके ब्लॉग पर पहली बार आया हूँ !! अद्वितीय रचनाएं हैं आपकी!!पर ये कमेन्ट देने के लिए पूरा बायो- डाटा क्यूँ लेते हैं जी!
Posted by विनय on June 28, 2009 at 8:44 PM
आशा है कि आपको उत्तर मेल द्वारा मिल गया होगा।
धन्यवाद!
Posted by मुकेश कुमार तिवारी on June 25, 2009 at 4:40 PM
प्रिय विनय,
मैं अपने लैपटॉप की सेटिंग से परेशान था कि वह किसी भी एक्टिव कंटेंट की विण्डो को नही खोलने दे रहा था। इस बीच मैंने बहुत चाहा फिर भी रिस्पॉंड नही कर सका।
मुझे आपके ब्लॉग टेम्पलेट्स शायद अभी तक देखे सभी ब्लॉगस में सबसे सुन्दर लगे।
और अच्छी रचनाओं से खूबसूरती और बढ जाती है।
यदि संभव हो तो अपना मोबाईल नं दीजियेगा, मैं भी उन्नाव का ही मूल बाशींदा हूँ, फिल्हाल इन्दौर में हूँ।
मुकेश कुमार तिवारी
+९१९४२५०६५११५
दौर
Posted by विनय on June 28, 2009 at 8:44 PM
जी शीघ्र ही मैं आपको मेल द्वारा सूचित कर दूँगा।
धन्यवाद!
Posted by chandan on June 22, 2009 at 1:40 AM
bahut umda
Posted by जाकिर अली 'रजनीश' on June 18, 2009 at 10:43 AM
अब तो इसमें मिलन का जल डालना होगा, वर्ना अंजाम तो कोई भी समझ सकता है।