जो इश्क़ की आग भड़क उठी है

जो इश्क़ की आग भड़क उठी है
जैसे मैं शोलों में जल रहा हूँ

तेरे बदन की कशिश का है जादू
देखकर तुझ को मचल रहा हूँ

मुझे है ख़ाहिशो-तमन्ना1 तेरी
मैं उम्मीद को मसल रहा हूँ

एक यह ख़ाब मैं देखता हूँ कि
तेरी मरमरीं बाँहों में पिघल रहा हूँ

शब्दार्थ:
1. ख़ाहिशो-तमन्ना: इच्छा और चाह


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

24 Responses to this post.

  1. Posted by mithilesh dubey on August 13, 2009 at 8:53 PM

    भाई वहा क्या बता है। लाजवाब रचना

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  2. इतनी बढ़िया-बढ़िया ग़ज़ल |
    आप मेरे ब्लॉग रोल में शामिल आज से |

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  3. इतनी गर्मी पहले ही पड़ रही है
    उस पर आगमआग
    जागकर जल्‍दी बंदे
    सर्दी की ओर भाग।

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  4. उम्दा भाव.

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  5. अहसासे-प्यार का प्यारा सा अहसास दिलाती आपकी रचना अच्छी लगी, बधाई स्वीकार करें.

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  6. बहुत खूब। बहुत सुंदर रचना।

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  7. आपके ब्लॉग पर पहली बार आया हूँ !! अद्वितीय रचनाएं हैं आपकी!!पर ये कमेन्ट देने के लिए पूरा बायो- डाटा क्यूँ लेते हैं जी!

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    • आशा है कि आपको उत्तर मेल द्वारा मिल गया होगा।

      धन्यवाद!

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  8. प्रिय विनय,

    मैं अपने लैपटॉप की सेटिंग से परेशान था कि वह किसी भी एक्टिव कंटेंट की विण्डो को नही खोलने दे रहा था। इस बीच मैंने बहुत चाहा फिर भी रिस्पॉंड नही कर सका।

    मुझे आपके ब्लॉग टेम्पलेट्स शायद अभी तक देखे सभी ब्लॉगस में सबसे सुन्दर लगे।

    और अच्छी रचनाओं से खूबसूरती और बढ जाती है।

    यदि संभव हो तो अपना मोबाईल नं दीजियेगा, मैं भी उन्नाव का ही मूल बाशींदा हूँ, फिल्हाल इन्दौर में हूँ।

    मुकेश कुमार तिवारी
    +९१९४२५०६५११५
    दौर

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    • जी शीघ्र ही मैं आपको मेल द्वारा सूचित कर दूँगा।

      धन्यवाद!

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  9. Posted by chandan on June 22, 2009 at 1:40 AM

    bahut umda

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  10. अब तो इसमें मिलन का जल डालना होगा, वर्ना अंजाम तो कोई भी समझ सकता है।

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