जो इश्क़ की आग भड़क उठी है
जैसे मैं शोलों में जल रहा हूँ
तेरे बदन की कशिश का है जादू
देखकर तुझ को मचल रहा हूँ
मुझे है ख़ाहिशो-तमन्ना1 तेरी
मैं उम्मीद को मसल रहा हूँ
एक यह ख़ाब मैं देखता हूँ कि
तेरी मरमरीं बाँहों में पिघल रहा हूँ
शब्दार्थ:
1. ख़ाहिशो-तमन्ना: इच्छा और चाह
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४
Archive for May 8th, 2009
8 May




















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