हुआ है आज उनका फ़ैसला मेरे ख़िलाफ़
सुनने में आया है न करेंगे मुझे मुआफ़
उस ने एक भी मौक़ा न दिया मुझ को
जो उनसे मिलके करते अपना दिल साफ़
आये तो मौत आये उनके सामने सुकूँ से
देखें वह रूह से छुटता हुआ मेरा लिहाफ़
ढल रही थी धीरे-धीरे सहर में यह रात
पड़ रहा धीरे-धीरे मेरे दिल में शिगाफ़
शब्दार्थ:
मुआफ़: माफ़, क्षमा; लिहाफ़: वस्त्र; सहर: भोर, प्रभात; शिगाफ़: दरार, चटकना
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४




















Posted by साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन on April 20, 2009 at 12:07 PM
पर हम, उन्हें माफ नहीं करेगे, जिन्होंने आपको अपनी बात रखने का मौका भी न दिया।
क्या सच में ऐसा है।
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खुशियों का विज्ञान-3
एक साइंटिस्ट का दुखद अंत
Posted by Manju on April 20, 2009 at 10:23 AM
bahut sundar rachna!
Posted by Abhishek on April 19, 2009 at 9:17 PM
सुन्दर !अच्छा लगा !
“आये तो मौत आये उनके सामने सुकूँ से
देखें वह रूह से छुटता हुआ मेरा लिहाफ़”
लिहाफ! क्या बात है!
Posted by संगीता पुरी on April 19, 2009 at 1:37 PM
बहुत बढिया लिखा …
Posted by रूपचन्द्र शास्त्री मयंक on April 19, 2009 at 8:58 AM
हुआ है आज उनका फ़ैसला मेरे ख़िलाफ़
सुनने में आया है न करेंगे मुझे मुआफ़
बहुत बढिया, विनय जी।
शुभकामनाएँ।
Posted by रूपचन्द्र शास्त्री मयंक on April 19, 2009 at 8:59 AM
रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (08:58:44) : Your comment is awaiting moderation
हुआ है आज उनका फ़ैसला मेरे ख़िलाफ़
सुनने में आया है न करेंगे मुझे मुआफ़
बहुत बढिया, विनय जी।
शुभकामनाएँ।
Posted by विनय on April 19, 2009 at 11:23 AM
धन्यवाद!
Posted by Shyamal Suman on April 19, 2009 at 7:44 AM
बहुत खूब। मेरी तुकबंदी भी देखिये-
बन के जीना चाहता था आदमी पर क्या करूँ।
प्रियतमा ने कह दिया कि आप लगते हैं जिराफ।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
http://www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
Posted by विनय on April 19, 2009 at 11:22 AM
तस्वीर में आपकी गर्दन इतनी लम्बी तो नहीं, ज़रा अपनी प्रियतमा का फ़ोन नम्बर देंवे, फिर यह ज़िराफ़ वाला क़िस्सा ज़रा सुलझेगा! हम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्!