वह मुस्कुराया और रूठा भी
वह सच्चा है और झूठा भी
दूर था तो क़रीब था दिल के
उसकी बात से दिल टूटा भी
इक ख़ाब माना हमने जिसको
वह छाला बनकर फूटा भी
जिस कशिश पे हम मर बैठे
उस कशिश ने दिल लूटा भी
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४
13 Apr
वह मुस्कुराया और रूठा भी
वह सच्चा है और झूठा भी
दूर था तो क़रीब था दिल के
उसकी बात से दिल टूटा भी
इक ख़ाब माना हमने जिसको
वह छाला बनकर फूटा भी
जिस कशिश पे हम मर बैठे
उस कशिश ने दिल लूटा भी
Posted by विनय on April 14, 2009 at 9:33 AM
आप सभी के प्रेम और स्नेह का आभार
Posted by realaman1980 on April 14, 2009 at 7:55 AM
वह छाला बनकर फूटा भी
Posted by विनय on April 14, 2009 at 9:31 AM
Posted by arsh on April 13, 2009 at 10:21 PM
waah ji saahib bahot khub rahe ye gazal bhi kafiye ko kitni karine se aapne milaayaa hai…wese tha ko ta me likhaa jaa sakta hai sahi kiya hai aapne… badhaayee aapko…
arsh
Posted by MEET on April 13, 2009 at 9:22 PM
सही है भाई.
Posted by संगीता पुरी on April 13, 2009 at 4:16 PM
बहुत बढिया …
Posted by mehek on April 13, 2009 at 4:11 PM
जिस कशिश पे हम मर बैठे
उस कशिश ने दिल लूटा भी
waah behtarin
Posted by manju on April 13, 2009 at 2:42 PM
इक ख़ाब माना हमने जिसको
वह छाला बनकर फूटा भी
bahut sunder lines, or thanks bhi vinay ji.
Posted by Neeraj on April 13, 2009 at 1:13 PM
दूर था तो क़रीब था दिल के
उसकी बात से दिल टूटा भी
बहुत खूब विनय जी….लिखते रहें…
नीरज
Posted by seema gupta on April 13, 2009 at 12:56 PM
इक ख़ाब माना हमने जिसको
वह छाला बनकर फूटा भी
” भावुक और दर्द भरे शब्द..’
Regards