वह मुस्कुराया और रूठा भी

वह मुस्कुराया और रूठा भी
वह सच्चा है और झूठा भी

दूर था तो क़रीब था दिल के
उसकी बात से दिल टूटा भी

इक ख़ाब माना हमने जिसको
वह छाला बनकर फूटा भी

जिस कशिश पे हम मर बैठे
उस कशिश ने दिल लूटा भी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

10 Responses to this post.

  1. आप सभी के प्रेम और स्नेह का आभार :)

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  2. Posted by realaman1980 on April 14, 2009 at 7:55 AM

    वह छाला बनकर फूटा भी

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    • :( ???

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  3. Posted by arsh on April 13, 2009 at 10:21 PM

    waah ji saahib bahot khub rahe ye gazal bhi kafiye ko kitni karine se aapne milaayaa hai…wese tha ko ta me likhaa jaa sakta hai sahi kiya hai aapne… badhaayee aapko…

    arsh

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  4. सही है भाई.

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  5. Posted by संगीता पुरी on April 13, 2009 at 4:16 PM

    बहुत बढिया …

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  6. जिस कशिश पे हम मर बैठे
    उस कशिश ने दिल लूटा भी

    waah behtarin

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  7. इक ख़ाब माना हमने जिसको
    वह छाला बनकर फूटा भी

    bahut sunder lines, or thanks bhi vinay ji.

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  8. दूर था तो क़रीब था दिल के
    उसकी बात से दिल टूटा भी
    बहुत खूब विनय जी….लिखते रहें…
    नीरज

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  9. इक ख़ाब माना हमने जिसको
    वह छाला बनकर फूटा भी

    ” भावुक और दर्द भरे शब्द..’

    Regards

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