सहर-ब-सहर1 मैं ढूँढ़ता रहा शुआएँ2
कहाँ छिप गयीं नूर-सी रोशन निगाहें
न कोई घर रहा मेरा न कोई ठिकाना
मेरी मंज़िल तो बन गयीं अब ये राहें
है जो दर्द सो अब तन्हाई से है मुझे
असरकार हों, कुछ काम आयें दुआएँ3
न दोस्त न नासेह4 न चारागर5 न वाइज़6
कोई भी नहीं लेता अपने सर ये बलाएँ
जो जाते हैं अपना दामन [...]
Archive for March 31st, 2009
31 Mar




















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