कैसे मिलूँ तुमसे जो न मिलना चाहो
चला चलूँ अगर साथ चलना चाहो
नहीं कहते हो मुझ से हर बार तुम
करूँ क्या’ जो तुम ख़ुद जलना चाहो
मैं मसख़रा ही सही तुम तो गुल हो
तुमको हँसा दूँ जो तुम खिलना चाहो
देख लो मेरी दीवानगी एक बार तुम
बिखेरो मुझे’ जो तुम संभलना चाहो
शब्दार्थ:
मसख़रा: clown, joker, मज़ाकिया
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४




















Posted by Vivek Kesarwani on March 16, 2009 at 12:17 AM
Very Nice Post. kaise seekho kavita likhna jo mai seekhna chahoo?
Posted by Manju on March 9, 2009 at 10:45 AM
Gd morng,
bahut sunder likha hain aapney
Posted by संगीता पुरी on March 8, 2009 at 10:32 PM
अच्छी अभिव्यक्ति दी भावों की …. होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं।
Posted by राज भाटिय on March 8, 2009 at 4:22 PM
बहुत ही सुंदर.
धन्यवाद
आपको और आपके परिवार को होली की रंग-बिरंगी भीगी भीगी बधाई।
बुरा न मानो होली है। होली है जी होली है
Posted by arsh on March 8, 2009 at 11:44 AM
sundar kathya…kubsurat….
Posted by shobha on March 8, 2009 at 10:24 AM
सुन्दर प्रस्तुति।
Posted by mehek on March 8, 2009 at 8:05 AM
sundar bhav badhai