तेरी तीरे-नज़र किस अदा से यार उठती है
रह-रहकर रुक-रुककर बार-बार उठती है
हम बीमारि-ए-इश्क़ के मारे हुए हैं और
तेरी नज़र पैनी हो कर बार-बार उठती है
नाज़ो-नख़्वत1 के पैमाने किस तरह उठाऊँ
नज़र उठती है तो ज़िबह2 को यार उठती है
हम देखते हैं तेरे जानिब3 प्यार की नज़र से
तेरी नज़र, उफ़! मानिन्दे-कटार4 उठती है
ग़ैर से तुम को मोहब्बत हुई है बे-वजह
और फिर भी नज़र बाइसे-गुफ़्तार5 उठती है
हैं चमन में और भी नज़ारे ऐ ‘नज़र’ लेकिन
फिर क्यों तेरी नज़र सिम्ते-यार6 उठती है
शब्दार्थ:
1. नाज़ और नख़रे; 2. लड़ाई, क़त्ल; 3. ओर, तरफ़; 4. तलवार की तरह (आवाज़ करती हुई); 5. बात करने के लिए; 6. प्रेयसी की तरफ़
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४




















Posted by विनय on March 6, 2009 at 10:11 PM
आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद!
Posted by तस्लीम on March 6, 2009 at 11:25 AM
बहुत खूब कहा है।
Posted by राज भाटिय on March 5, 2009 at 11:29 PM
बहुत ही सुंदर, कटार से भी ज्यादा तेज
धन्यवाद
Posted by Satish Chandra satyarthi on March 5, 2009 at 10:45 PM
क्या बात है !!
सुभान अल्लाह
Posted by Manju"Mahiraj" on March 5, 2009 at 11:37 AM
bahut sunder likha aapney badhaii
Posted by समीर लाल on March 5, 2009 at 10:56 AM
बेहतरीन गज़ल.
Posted by arsh on March 5, 2009 at 9:13 AM
bahot achhe……..