ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए
दिल के कोने-कोने तक छितरे हुए
वह अब कहाँ बाक़ी जो था मुझमें
मैं अब कहाँ ढूँढू जो था तुझमें
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए
भीगी-भीगी थी ज़मीं सूखे पाँव थे
जलते-बुझते पुराने घाव थे
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए
जुगनू दो आँखों में तिरने लगे हैं
चिन्गारियों से चुभने लगे हैं
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए
बुझते हुए दिए को जलाऊँ कैसे
दबी हसरतों को बुझाऊँ कैसे
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४




















Posted by महावीर on February 2, 2009 at 10:01 PM
आपकी यह नज़्म बहुत पसंद आई, ख़ास करः
भीगी-भीगी थी ज़मीं सूखे पाँव थे
जलते-बुझते पुराने घाव थे
ख़ाब सब ख़ाब हैं आँखों में बिखरे हुए
Posted by विनय on February 2, 2009 at 11:06 PM
चरणस्पर्श महावीर जी, अपना आशीर्वाद बनाये रखें! धन्यवाद!
Posted by विनय on February 2, 2009 at 5:40 PM
शुक्रिया मुस्कान जी!