उसने हमसे कभी वफ़ा न की
और हमने भी तमन्ना न की
बहुत बोलते हैं सब ने कहा
सो आदत-ए-कमनुमा न की
बहुत आये बहुत गये मगर
जान किसी पर फ़िदा न की
उसने कही और हमने मानी
उसकी कोई बात मना न की
ख़ता-ए-इश्क़ के बाद हमने
फिर कभी यह ख़ता न की
बात थी सो दिल में रह गयी
सामने पड़े तो नुमाया न की
जिससे मुँह फेर लिया हमने
फिर कभी बात आइंदा न की
उम्मीद मर गयी सो मर गयी
वह बाद कभी ज़िन्दा न की
चोट दोस्ती में खायी है ‘नज़र’
किसी से नज़रे-आशना न की
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४




















Posted by विनय on January 31, 2009 at 7:16 PM
thanks mahiraj jee
Posted by Manju"Mahiraj" on January 31, 2009 at 5:04 PM
vinay ji ye bhi bahut khub hai . wah wah……………………………………………………………………………………………………………………………………………………………….
Posted by विनय on January 31, 2009 at 1:40 PM
आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया!
Posted by seema gupta on January 29, 2009 at 8:53 AM
जिससे मुँह फेर लिया हमने
फिर कभी बात आइंदा न की
” आह इतनी बेरुखी..’
Regards
Posted by paramjitbali on January 28, 2009 at 8:10 PM
bahut sundar gajal hai
Posted by Shikha Deepak on January 28, 2009 at 7:07 PM
दर्द की ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति।
Posted by ravindra.prabhat on January 28, 2009 at 6:21 PM
जनाब! कुछ मजबूरियां रही होंगी …./