जो मुझे होता है वह दर्द तुझ तक पहुँचे
यूँ इस ख़ला की यह गर्द तुझ तक पहुँचे
की है इस दिल ने सदा तुझसे मोहब्बत
सादा-सादा इक यह फ़र्द तुझ तक पहुँचे
धूप सारे आलम में महकी हुई है हर-सू
कि मेरे सीने की यह सर्द तुझ तक पहुँचे
चमन-चमन में है आज मौसम-ए-बहार
कभी यह मौसम-ए-ज़र्द तुझ तक पहुँचे
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४




















Posted by Digamber Naswa on January 6, 2009 at 8:01 PM
की है इस दिल ने सदा तुझसे मोहब्बत
सादा-सादा इक यह फ़र्द तुझ तक पहुँचे
सभी शेर इतने खूबसूरत हैं की बार बार पढने को जी करता है, पर मुझे ये ख़ास लगा
Posted by विनय on January 6, 2009 at 6:27 PM
राज, बवाल और अमित जी आपका स्नेह बना रहे, धन्यवाद!
Posted by Amit on January 6, 2009 at 9:57 AM
काफ़ी अच्छा लिखा है आपने
Posted by Bavaal on January 6, 2009 at 9:41 AM
जो मुझे होता है वह दर्द तुझ तक पहुँचे
यूँ इस ख़ला की यह गर्द तुझ तक पहुँचे
बहुस्नोख़ूब पेश ग़ज़ल है ये नज़र भाई आपकी.
Posted by राज भाटिया on January 5, 2009 at 11:09 PM
चमन-चमन में है आज मौसम-ए-बहार
कभी यह मौसम-ए-ज़र्द तुझ तक पहुँचे
बहुत खुब लिखा आप ने , हर शेर एक से बढ कर एक.
धन्यवाद
Posted by विनय on January 5, 2009 at 10:45 PM
अनिल, स्वप्न, अर्श और नीरज जी आपका बहुत-बहुत आभार की आपने टिप्पणी दी, धन्यवाद!
Posted by neeraj on January 5, 2009 at 10:28 PM
एक बहुत मुश्किल काफिये को बड़ी अच्छे से निभाया है आपने…बधाई…
नीरज
Posted by arsh on January 5, 2009 at 9:16 PM
धूप सारे आलम में महकी हुई है हर-सू
कि मेरे सीने की यह सर्द तुझ तक पहुँचे
बहोत खूब विनय भाई बहोत खूब लिखा है आपने….ढेरो बधाई कुबूल करें …
अर्श
Posted by swapn on January 5, 2009 at 8:32 PM
bahut achcha likha hai aapne rachna chhoti hai lekin gagar men sagar hai. swapn
Posted by Anil Kant on January 5, 2009 at 7:46 PM
काफ़ी अच्छा लिखा है आपने