रातभर चाँद देखा किये

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये
रातभर चाँद देखा किये

कभी हाथ से ढका चाँद को
कभी बादलों से उठाया भी
गदेली पर रखकर उसे
कभी होंटों तक लाया भी

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…

सितारे टूटते बुझते रहे
उनसे तुम्हें माँगते रहे
ख़ाली था ख़ामोश था लम्हा
हम तेरा नाम लिखते रहे

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…

रूह बर्फ़ में जलने लगी
साँस-साँस पिघलने लगी
तेरी तस्वीर देखकर
तन्हाई मसलने लगी

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…

सन्नाटों में बहता रहा
ख़ामोशी से कहता रहा
तुम कहाँ अब कैसी हो
मैं कोहरे सहता रहा

रातभर चाँद देखा किये
माज़ी में उड़ रहीं थीं
तेरी यादें समेटा किये…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

15 Responses to this post.

  1. निर्मला और महावीर जी, नववर्ष की बहुत-बहुत बधाई, नववर्ष आपके लिए कल्याणकारी हो।

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  2. रूह बर्फ़ में जलने लगी
    साँस-साँस पिघलने लगी
    तेरी तस्वीर देखकर
    तन्हाई मसलने लगी

    बहुत ख़ूब।
    नव वर्ष की हार्दिक मंगलकामानाएं।

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  3. नव वर्ष की शुभ कामनायें आपकी कलम को बल और गति मिले

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  4. अपने सभी पाठकों का तहे दिल से धन्यवाद करता हूँ कि वह सदैव अपना स्नेह बनाये रखें\ बवाल जी बहुत-बहुत शुक्रिया कि आप ने मेरी तारीफ़ इतना आला शे’र कहा! आप सभी को नववर्ष की बहुत-बहुत बधाई, नववर्ष आप सबके लिए कल्याणकारी हो।

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