कभी कहीं हम-तुम मिलते, जब मिलते
लड़ते-झगड़ते, बिगड़ते-बड़बड़ाते
रूठते-मनाते और फिर चिढ़ते-चिढ़ाते
कभी कहीं हम-तुम, कभी कहीं हम-तुम
नहीं तुम, नहीं तुम! तुम्हें कुछ नहीं आता
इस बात पर तुम लड़ती, मैं झगड़ता
काश! ऐसा भी तेरे-मेरे साथ हो जाता
कभी कहीं कभी कहीं, कभी कहीं हम-तुम
पीछे-पीछे मैं तुम्हारे आता, तुम पलटती
मैं तुमको फूल देता और मुस्कुराता
तुम रूठती, मुँह बनाती, मैं मनाता
कभी कहीं कभी कहीं, कभी कहीं हम-तुम
छोटी-छोटी बातों पर बार-बार चिढ़ जाती
चिढ़कर मुझको चिढ़ाती, मुँह फुलाती
आँखें दिखाती, रूठी हो मुझको जताती
कभी कहीं कभी कहीं, कभी कहीं हम-तुम
कभी-कभी चोरी-चोरी तुम मुझको देखती
मैं कहता ‘क्या है’, तुम कहती ‘कुछ नहीं’
हम आँखों में एक-दूसरे का दिल पढ़ते
कभी कहीं कभी कहीं, कभी कहीं हम-तुम
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४




















Posted by Manju on January 22, 2009 at 4:16 PM
Vinay ji,
Aap ne ye bhi khoob likha hain abhi pada hai. bahut sararat hai ismy.
Posted by Digamber Naswa on December 20, 2008 at 6:44 PM
नहीं तुम, नहीं तुम! तुम्हें कुछ नहीं आता
इस बात पर तुम लड़ती, मैं झगड़ता
काश! ऐसा भी तेरे-मेरे साथ हो जाता
लाजवाब लिखा है, दिल के आस-पास बिखरी यादें हैं आप की नज़्म
Posted by Ambuj on December 19, 2008 at 5:18 PM
एक मीठी सी शरारत लिए हुए है ये कविता…
http://jhankar.wordpress.com
Posted by विनय on December 20, 2008 at 9:51 AM
शोभा, सीमा और अम्बुज जी आप सभी पाठकों का सहर्ष स्वागत है!
Posted by seema gupta on December 18, 2008 at 11:12 AM
कभी-कभी चोरी-चोरी तुम मुझको देखती
मैं कहता ‘क्या है’, तुम कहती ‘कुछ नहीं’
हम आँखों में एक-दूसरे का दिल पढ़ते
कभी कहीं कभी कहीं, कभी कहीं हम-तुम
“chori chori…..”
regards
Posted by shobha on December 17, 2008 at 9:22 PM
बहुत बढ़िया लिखा है।