सहने दे ग़म थोड़ा – थोड़ा
जो तुमने रुख़ मोड़ा-मोड़ा
जान यह जाने दे ज़रा-ज़रा
रहने दे आँखों को भरा-भरा
सपने सारे मेरे टूटे
जो साथी तुम मुझसे रूठे
मरना गर मेरा वफ़ा हो
तो मेरी जान क्यों ख़फ़ा हो
आना तो न जाना तुम कभी
तुमसे हैं मेरी जाँ ख़ाब सभी
साँसें बन जाओ ख़ाली सीने की
प्यास दे जाओ जीने की
दिल मेरा भी इक ख़ला है
तेरे इन्तिज़ार में जला है
ये लम्हे रोक लो तुम
फिर न आयेंगे हुए जो ग़ुम
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४




















Posted by विनय on December 4, 2008 at 9:05 PM
मधुप भाई सलाह का शुक्रिया! सभी पाठकों का सहृदय धन्यवाद!
Posted by hemjyotsana "Deep" on December 3, 2008 at 1:56 PM
बहुत बडिया नजर जी ,
दिल मेरा भी इक ख़ला है
तेरे इन्तिज़ार में जला है
वाह
Posted by Bavaal on November 26, 2008 at 1:48 PM
khoobsoorat likha vinay bhai, baat sachmuch saj rahee hai in alfaazon men.
Posted by अशोक मधुप on November 23, 2008 at 9:19 AM
भाई बहुत अच्छा लिख रहे हो ,बधाई। थोड़ा काव्य शास्त्र एवं छंद विन्यास आैर पढ़ो
Posted by विनय on November 22, 2008 at 12:15 PM
शुक्रिया अर्श, महक और महावीर जी आपका!
Posted by महावीर on November 22, 2008 at 3:13 AM
अच्छी काविश है।
दिल मेरा भी इक ख़ला है
तेरे इन्तिज़ार में जला है
Posted by mehek on November 21, 2008 at 10:52 PM
साँसें बन जाओ ख़ाली सीने की
प्यास दे जाओ जीने की
दिल मेरा भी इक ख़ला है
तेरे इन्तिज़ार में जला है
bahut sundar
Posted by arsh on November 21, 2008 at 6:02 PM
बहोत खूब लिखा संगीत मय ,मज़ा आ गया ,ढेरो बधाई आपको