रोज़ ही होता है

रोज़ ही होता है होंठों तक बात आते-आते रह जाती है
मेरी इक कमी तेरे रू-ब-रू मुझे लब खोलने नहीं देती

कितना मुश्किल है ख़ुद ही ग़लत होने का एहसास!


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

5 Responses to this post.

  1. शुक्रिया, शुक्रिया, शुक्रिया!

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  2. Good…. really good

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  3. कितना मुश्किल है ख़ुद ही ग़लत होने का एहसास!

    ” lakin ek sach bhee to hai… or sach hmesha hee kadva hotta hai na”

    Regards

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  4. बहुत बढीया लेख।
    खूद गलत होने का एहसास सच मे बहुत मूश्किल होता है।

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  5. Posted by arsh on November 16, 2008 at 4:00 PM

    ye bhi khub raha ,umda lekhan ..,wah…….

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