रोज़ ही होता है होंठों तक बात आते-आते रह जाती है
मेरी इक कमी तेरे रू-ब-रू मुझे लब खोलने नहीं देती
कितना मुश्किल है ख़ुद ही ग़लत होने का एहसास!
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४
16 Nov
रोज़ ही होता है होंठों तक बात आते-आते रह जाती है
मेरी इक कमी तेरे रू-ब-रू मुझे लब खोलने नहीं देती
कितना मुश्किल है ख़ुद ही ग़लत होने का एहसास!
Posted by विनय on November 18, 2008 at 2:44 PM
शुक्रिया, शुक्रिया, शुक्रिया!
Posted by Rohit Jain on November 17, 2008 at 11:10 PM
Good…. really good
Posted by seema gupta on November 17, 2008 at 1:12 PM
कितना मुश्किल है ख़ुद ही ग़लत होने का एहसास!
” lakin ek sach bhee to hai… or sach hmesha hee kadva hotta hai na”
Regards
Posted by कुन्नू सिंह on November 16, 2008 at 8:49 PM
बहुत बढीया लेख।
खूद गलत होने का एहसास सच मे बहुत मूश्किल होता है।
Posted by arsh on November 16, 2008 at 4:00 PM
ye bhi khub raha ,umda lekhan ..,wah…….