एक ख़ामोश अफ़साना जो तुम्हारी नज़रों ने सुनाया है मुझे
काश! वह तुम अपने लबों से मेरे लबों पर लिखती कभी,
इससे तेरी ज़िन्दगी के कुछ पल मेरे हिस्से तो आ जाते!
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४
16 Nov
एक ख़ामोश अफ़साना जो तुम्हारी नज़रों ने सुनाया है मुझे
काश! वह तुम अपने लबों से मेरे लबों पर लिखती कभी,
इससे तेरी ज़िन्दगी के कुछ पल मेरे हिस्से तो आ जाते!
Posted by विनय on November 16, 2008 at 3:45 PM
अर्श और मकरंद जी शुक्रिया!
Posted by makrand on November 16, 2008 at 3:05 PM
bahut khub
Posted by arsh on November 16, 2008 at 2:54 PM
umda triveni mari hai bhai vinay aapne.. gazab ki gahari thinking … ye andaza to koi aap se sikhe.. dhero badhai saab…