तन्हाई में भी हम दोनों साथ हैं
यूँ लगता है मानो हाथों में हाथ हैं
वह पहली शाम जब देखा था तुम्हें
मैं आज तक भूला नहीं हूँ
वह पहली झलक’ वह पहली हँसी
मैं आज तक भूला नहीं हूँ
दूर होकर भी हम-दोनों साथ हैं
यूँ लगता है मानो हाथों में हाथ हैं
तुम जो आती थी’ तुम जो जाती थी
जैसे उड़ते बादलों में चाँद छिपता है
आती है बहुत तेरी याद मुझे
जब उड़ते बादलों में चाँद छिपता है
उलझे हुए दोनों के जज़्बात हैं
यूँ लगता है मानो हाथों में हाथ हैं
तुम याद आती हो मुझे इस तरह
मैं ख़ुद को भी भूल गया हूँ
तेरे सपनों में खोया हूँ आठों पहर
सारा ज़माना भूल गया हूँ
दो अन्जान मुसाफ़िर जो साथ हैं
यूँ लगता है मानो हाथों में हाथ हैं
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४




















Posted by विनय on March 7, 2009 at 1:23 PM
यार मुझे तुम्हारा ब्लॉग तो नहीं मिला, लेकिन अगर इसे तुम लोगों तक पहुँचाने की सोच रहे हो तो ब्लॉगवाणी और चिट्ठाचर्चा पर जोड़ दो!
Posted by ASHWANI R.DEV(LUCK) on March 7, 2009 at 12:00 PM
VINAY JI MAIN APNE BLOG KO LOGO TAK KAISE POST KAROON
BATA DIJIYE PL’S MERA BLOG ASHWANIDEV.BLOG SPOT HAI MUJHE MAAF KARAN MAIN AAP SE BAHUT CHHOTA HOON AUR TAJURBE MAIN BHI CHHOTA HOON SORRY…MERI GALTIYON KO BHI BATA TE RAHIYE GA THANK’S