उस्लूब*, उस्लूब, उस्लूब
क्या पढ़ने वाले इनको समझते हैं
वज़नी हो सीने पर गर ज़ख़्म
उसे पढ़ने वाले दर्द को समझते हैं
* लेखन के नियम अथवा शैली
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
Archive for October 13th, 2008
13 Oct
13 Oct
उस्लूब*, उस्लूब, उस्लूब
क्या पढ़ने वाले इनको समझते हैं
वज़नी हो सीने पर गर ज़ख़्म
उसे पढ़ने वाले दर्द को समझते हैं
* लेखन के नियम अथवा शैली
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
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