बहुत पुराना है वह रिश्ता

बहुत पुराना है वह रिश्ता
जिसे गठरी में बाँधकर रखा है
मेहमान को बिठाया बाहर
घर को किराये पर दे रखा है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

5 Responses to this post.

  1. Posted by prakash on October 30, 2008 at 12:58 PM

    a deep thinking …………..

    arsh

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  2. मकरंद, नीशू, और सीमा जी आप सभी का धन्यवाद!

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  3. बहुत पुराना है वह रिश्ता
    जिसे गठरी में बाँधकर रखा है
    मेहमान को बिठाया बाहर
    घर को किराये पर दे रखा है

    ‘wah, gjab kee soch or shabd sanyogen’

    regards

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  4. Posted by neeshoo on October 12, 2008 at 9:18 PM

    kya baat bahut accha likah hai

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  5. बहुत पुराना है वह रिश्ता
    जिसे गठरी में बाँधकर रखा है
    मेहमान को बिठाया बाहर
    घर को किराये पर दे रखा है

    bahut sunder

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