बहुत पुराना है वह रिश्ता
जिसे गठरी में बाँधकर रखा है
मेहमान को बिठाया बाहर
घर को किराये पर दे रखा है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
12 Oct
बहुत पुराना है वह रिश्ता
जिसे गठरी में बाँधकर रखा है
मेहमान को बिठाया बाहर
घर को किराये पर दे रखा है
Posted by prakash on October 30, 2008 at 12:58 PM
a deep thinking …………..
arsh
Posted by विनय on October 13, 2008 at 2:53 PM
मकरंद, नीशू, और सीमा जी आप सभी का धन्यवाद!
Posted by seema gupta on October 13, 2008 at 10:42 AM
बहुत पुराना है वह रिश्ता
जिसे गठरी में बाँधकर रखा है
मेहमान को बिठाया बाहर
घर को किराये पर दे रखा है
‘wah, gjab kee soch or shabd sanyogen’
regards
Posted by neeshoo on October 12, 2008 at 9:18 PM
kya baat bahut accha likah hai
Posted by makrand on October 12, 2008 at 8:59 PM
बहुत पुराना है वह रिश्ता
जिसे गठरी में बाँधकर रखा है
मेहमान को बिठाया बाहर
घर को किराये पर दे रखा है
bahut sunder