Archive for October 11th, 2008

धीरे-धीरे ग़म सहना

धीरे-धीरे ग़म सहना,
किसी से कुछ न कहना
फ़ितरत ऐसी हो गयी,
दिन-रात मरके जीना
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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