मैं रोज़ नयी तकलीफ़ें बुनता हूँ
ज़िन्दगी के इस पुराने करघे पर
कि मैंने कभी सूत भी काता है
रिश्तों के इस टूटे हुए चरख़े पर
आँखें वीरान हैं दूर तक रेत ही रेत है
पानी का कहीं नामो-निशाँ नहीं है
सूरज भी उसकी मुस्कुराहट का ना आया, वो कहाँ है?
मेरी हर रात सूखकर बंजर हो गयी है
मोहब्बत मेरी अफ़साना बन [...]
Archive for October 4th, 2008
4 Oct
मैं रोज़ नयी तकलीफ़ें बुनता हूँ
Posted by विनय in मेरा गीत. Tagged: alone, अफ़साना, आँखें, आग, इश्क़, करघा, किरदार, खाल, गुनाह, चरख़ा, चाँद, तकलीफ़, धधक, निशाँ, पानी, प्यार, बंजर, बेजान, मुस्कुराहट, मोहब्बत, रात, रिश्ता, रूह, रेत, वीरान, शाम, सर्प, सूत, सूरज, ज़िन्दगी, bare, character, curse, dust, evening, eyes, fire, flame, guilt, life, lifeless, lonely, loom, love, misery, moon, night, scratch, skin, smile, snake, soul, Spinning wheel, story, sun, water. 9 Comments




















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