बड़ी उम्मीद से मैं चला था तआक़ुब-ए-इश्क़ पर
और दीदार उसका मुझको ही घायल कर गया है
अब सुबह का चाँद और शाम का सूरज दोनों यहीं!
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
20 Jul
बड़ी उम्मीद से मैं चला था तआक़ुब-ए-इश्क़ पर
और दीदार उसका मुझको ही घायल कर गया है
अब सुबह का चाँद और शाम का सूरज दोनों यहीं!
Posted by विनय प्रजापति on July 21, 2008 at 10:22 PM
आप सबका शुक्रिया!
Posted by Dr Anurag on July 21, 2008 at 7:58 PM
lajaavb……..dost……..
Posted by paramjitbali on July 20, 2008 at 10:43 PM
बड़ी उम्मीद से मैं चला था तआक़ुब-ए-इश्क़ पर
और दीदार उसका मुझको ही घायल कर गया है
बहुत बढिया!