Archive for July, 2008

बारहा पिरोये हैं कई ज़ख़्म

बारहा पिरोये हैं कई ज़ख़्म साँस के एक ही धागे में
टुकड़े-टुकड़े बिखरी हुई ज़िन्दगी बहुत नज़दीक़ लगी है
तुम नहीं मेरे साथ तो ज़िन्दगी एक अंधेरी ख़ला है!
बारहा: Several times

शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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यह सावन मेरा मन पढ़-पढ़ रोया

यह सावन मेरा मन पढ़-पढ़ रोया अबकि बार
यह गरज मुझे डराती रही तेरे तेवर की तरह
बदलना था तुम्हें तो मुझको तुमने बदला क्यों
हमने ग़म को पहना है दिल पे ज़ेवर की तरह
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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जाने कैसी तन्हाई रहती है

जाने कैसी तन्हाई रहती है महफ़िले-यार में
दिल में अब भी साँस लेते हैं वह पुराने नाम
तुमने मुझे भुलाके उसे याद रखा, तेरी अदा है!
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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मतलब से ही जनम लेता है कोई रिश्ता

मतलब से ही जनम लेता है कोई रिश्ता
मतलब से ही मिट जाता है वह रिश्ता
तख़लीक़ के इस भँवर में तकलीफ़ है बहुत
सँभलकर बुन जब भी बुन नया रिश्ता
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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यूँ तो दिल में इक ख़ला बसा रखी है

यूँ तो दिल में इक ख़ला बसा रखी है हमने, लेकिन
कभी-कभी सितारों के टुकड़े भी गुज़रते हैं इधर से
मैंने उसका दिल तोड़ा था पर उससे कुछ माँगा नहीं!
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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