बारहा पिरोये हैं कई ज़ख़्म साँस के एक ही धागे में
टुकड़े-टुकड़े बिखरी हुई ज़िन्दगी बहुत नज़दीक़ लगी है
तुम नहीं मेरे साथ तो ज़िन्दगी एक अंधेरी ख़ला है!
बारहा: Several times
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
30 Jul
बारहा पिरोये हैं कई ज़ख़्म साँस के एक ही धागे में
टुकड़े-टुकड़े बिखरी हुई ज़िन्दगी बहुत नज़दीक़ लगी है
तुम नहीं मेरे साथ तो ज़िन्दगी एक अंधेरी ख़ला है!
बारहा: Several times
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
29 Jul
यह सावन मेरा मन पढ़-पढ़ रोया अबकि बार
यह गरज मुझे डराती रही तेरे तेवर की तरह
बदलना था तुम्हें तो मुझको तुमने बदला क्यों
हमने ग़म को पहना है दिल पे ज़ेवर की तरह
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
28 Jul
जाने कैसी तन्हाई रहती है महफ़िले-यार में
दिल में अब भी साँस लेते हैं वह पुराने नाम
तुमने मुझे भुलाके उसे याद रखा, तेरी अदा है!
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
25 Jul
मतलब से ही जनम लेता है कोई रिश्ता
मतलब से ही मिट जाता है वह रिश्ता
तख़लीक़ के इस भँवर में तकलीफ़ है बहुत
सँभलकर बुन जब भी बुन नया रिश्ता
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
24 Jul
यूँ तो दिल में इक ख़ला बसा रखी है हमने, लेकिन
कभी-कभी सितारों के टुकड़े भी गुज़रते हैं इधर से
मैंने उसका दिल तोड़ा था पर उससे कुछ माँगा नहीं!
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
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