अश्क से पहले आँच उठती है
जब भी तुझपे आँख टिकती है
बाटे हुए सब वक़्त के धागे
पर उनमें अब गिरह दिखती है
थी कभी सीधी-सादी ज़िन्दगी
आज ही बिगड़ी हुई लगती है
निगेबाँ है मेरा पहला इश्क़
तो फ़िक्र मुझको ख़ाक चखती है
गर वह सोचे अश्क बुझते नहीं
रूखी-रूखी आँख मेरी हँसती है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४




















Posted by limit on July 4, 2008 at 12:28 PM
अश्क से पहले आँच उठती है
जब भी तुझपे आँख टिकती है
“bhut sunder abheevyektee’
Regards
Posted by विनय प्रजापति on June 19, 2008 at 1:31 PM
shukriya mehek ji.
Posted by mehhekk on June 19, 2008 at 9:41 AM
अश्क से पहले आँच उठती है
जब भी तुझपे आँख टिकती है
बाटे हुए सब वक़्त के धागे
पर उनमें अब गिरह दिखती है
थी कभी सीधी-सादी ज़िन्दगी
आज ही बिगड़ी हुई लगती है
wah bahut khub
Posted by विनय प्रजापति on June 19, 2008 at 12:36 AM
thanks anurag ji.
Posted by anurag arya on June 18, 2008 at 8:42 PM
बाटे हुए सब वक़्त के धागे
पर उनमें अब गिरह दिखती है
थी कभी सीधी-सादी ज़िन्दगी
आज ही बिगड़ी हुई लगती है
subhan allah ye sher seedhe dil me utar gaye yar….