अश्क से पहले आँच उठती है
जब भी तुझपे आँख टिकती है
बाटे हुए सब वक़्त के धागे
पर उनमें अब गिरह दिखती है
थी कभी सीधी-सादी ज़िन्दगी
आज ही बिगड़ी हुई लगती है
निगेबाँ है मेरा पहला इश्क़
तो फ़िक्र मुझको ख़ाक चखती है
गर वह सोचे अश्क बुझते नहीं
रूखी-रूखी आँख मेरी हँसती है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४
Archive for June 16th, 2008
16 Jun
अश्क से पहले आँच उठती है
16 Jun
तुमने हमसे हमको चुराया
तुमने हमसे हमको चुराया
दिल में अपने हमको बसाया
हम कुछ दीवाने हो गये हैं
हाँ, दूर ख़ुद से हो गये हैं
अपनी बाँहों में हमको छुपा लो सनम
अपनी बाँहों में हमको छुपा लो सनम
यह उड़ते बादल घिर जायें
बिजली ज़रा कड़क जाये
तू मेरी बाँहों में आकर के
मेरे सीने से सिमट जाये
यह बादल क्यूँ घिर आयें
और बिजली क्यूँ गिर जाये
हम तेरे ही [...]




















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