Archive for June 14th, 2008

मेरी हर नज़र

मेरी हर नज़र बेक़रार’ और रूह बेताब है,
लबों को भी न तस्लीम एक बूँद आब है
रोज़-रोज़ की मुश्किली, यही वह अज़ाब है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४ 

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न कोई शिकायत है

न कोई शिकायत है तुझसे न कोई गिला है
तुम अपने हसीं लबों से हर्फ़ छुओ न छुओ
कम-स-कम बाहम निगाहों में गुफ़्त-गू है!
बाहम= आपस में
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

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एक दोस्त मेरा भी हो

एक दोस्त मेरा भी हो
एक यार मेरा भी हो
जिसकी बाँहों में मुझे
मिल जाये ज़िन्दगी
जो झूठ-मूठ रूठ के
सताये, करे दिल्लगी
देखे हमने कई हसीं
लेकिन वह मिला नहीं
जो पहली नज़र में
दिल में उतर जाये
जो गहने उतारे गर
तो और सँवर जाये
दिल की दोस्ती के लिए
एक दोस्त मेरा भी हो
एक यार मेरा भी हो
ख़ुशबू हसीनों की मुझे
हमेशा बुलाती रही है
जो अभी [...]

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