खिली-खिली महकी बहारें हैं

May 7, 2008 at 8:05 am (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

खिली-खिली महकी बहारें हैं
झीलों पर बहते शिकारें हैं
ठण्डी-ठण्डी सौंधी हवाएँ हैं
गीले पत्तों को खनकाएँ हैं

जाने कैसी तलब जागी है
जाने किसका इन्तिज़ार है
बेज़ार-सा यह दिल मेरा
किसके लिए गुलज़ार है

आज ऐसा क्यों लग रहा है
नये-नये सब नज़ारें हैं
खिली-खिली महकी बहारें हैं
झीलों पर बहते शिकारें हैं

शबनमी रातों का यह चाँद
और उजली-उजली चाँदनी
आइनाए-दिल में कौन यार है
इश्क़ जिससे वजहसार है

बंजर ज़मीने-दिल से आज
उलझे हुए मखमली धारे हैं
खिली-खिली महकी बहारें हैं
झीलों पर बहते शिकारें हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

3 Comments

  1. mehhekk said,

    May 7, 2008 at 9:44 am

    शबनमी रातों का यह चाँद
    और उजली-उजली चाँदनी
    आइनाए-दिल में कौन यार है
    इश्क़ जिससे वजहसार है
    shandar lines,beautiful

  2. limit said,

    May 8, 2008 at 5:39 pm

    ’simtee simtee see ratoon mey,
    bhege bhege se fuaareyn hain,
    behke behke se hr lmhon mey,
    taire aaney ke jhunkareyn hain…”

    ” very beautifully composed, seems like a love song, good one”

  3. विनय प्रजापति said,

    May 9, 2008 at 12:14 am

    Thanks, Mehek & gr8 seema ji! beautiful lines…

Post a Comment