खिली-खिली महकी बहारें हैं
खिली-खिली महकी बहारें हैं
झीलों पर बहते शिकारें हैं
ठण्डी-ठण्डी सौंधी हवाएँ हैं
गीले पत्तों को खनकाएँ हैं
जाने कैसी तलब जागी है
जाने किसका इन्तिज़ार है
बेज़ार-सा यह दिल मेरा
किसके लिए गुलज़ार है
आज ऐसा क्यों लग रहा है
नये-नये सब नज़ारें हैं
खिली-खिली महकी बहारें हैं
झीलों पर बहते शिकारें हैं
शबनमी रातों का यह चाँद
और उजली-उजली चाँदनी
आइनाए-दिल में कौन यार है
इश्क़ जिससे वजहसार है
बंजर ज़मीने-दिल से आज
उलझे हुए मखमली धारे हैं
खिली-खिली महकी बहारें हैं
झीलों पर बहते शिकारें हैं
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

mehhekk said,
May 7, 2008 at 9:44 am
शबनमी रातों का यह चाँद
और उजली-उजली चाँदनी
आइनाए-दिल में कौन यार है
इश्क़ जिससे वजहसार है
shandar lines,beautiful
limit said,
May 8, 2008 at 5:39 pm
’simtee simtee see ratoon mey,
bhege bhege se fuaareyn hain,
behke behke se hr lmhon mey,
taire aaney ke jhunkareyn hain…”
” very beautifully composed, seems like a love song, good one”
विनय प्रजापति said,
May 9, 2008 at 12:14 am
Thanks, Mehek & gr8 seema ji! beautiful lines…