वह दिल में एक मस्जिद है
जिसमें रोज़ नमाज़ अदा करता हूँ
वह मन मन्दिर की देवी है
जिसकी साँझ-सवेरे पूजा करता हूँ
मैं ख़तावार हूँ गुनाहे-इश्क़ का
उसके दर पे रोज़ सजदे करता हूँ
वह संगदिल है नरम दिल भी
अपनी जान उसके सदक़े करता हूँ
मैंने उसके नाम से जीना जाना है
मैं बेपनाह उससे मोहब्बत करता हूँ
सारे जहाँ में वह ख़ुदा है मेरा
मैं सिर्फ़ उसकी अक़ीदत करता हूँ
मैं तलबगार हूँ उसके दिल का
अपना यह दिल उसके नाम करता हूँ
वह सिर्फ़ो-सिर्फ़ मेरा है बस
मैं हर मुक़ाबिल को पैग़ाम करता हूँ
” कोई एक भी नहीं मुझसा ज़माने में
एक दौर गुज़ार दोगे आज़माने में
हर हाल में जीतना मेरी फ़ितरत है
सौ उम्र लगा दोगे मुझको मिटाने में “
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४




















Posted by विनय प्रजापति on June 1, 2008 at 7:27 PM
@ आपका दोनों का तहे-दिल से शुक्रिया!
Posted by MS on May 31, 2008 at 11:08 AM
sang-e-khuda hai dilbar mera
jaanawaaz bewafa pe marta hoon
hothon pe aa ke thehar jaye jo
geet aisa yaaro main suna karta hoon
Posted by mehhekk on April 26, 2008 at 10:11 PM
मैंने उसके नाम से जीना जाना है
मैं बेपनाह उससे मोहब्बत करता हूँ
सारे जहाँ में वह ख़ुदा है मेरा
मैं सिर्फ़ उसकी अक़ीदत करता हूँ
wah ji wah masha alla bahut khub