रात चाँदनी का दरया हुई

April 18, 2008 at 1:40 pm (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

रात चाँदनी का दरया हुई
चल चाँद की कश्ती में दूर चलें
बादलों के पीछे,
तारों की छाँव में…
प्यार का हसीन कसूर करें

आज दिल दिल के क़रीब है
आज मोहब्बत ख़ुशनसीब है
तेरा मुझसे मिलना,
इत्तिफ़ाक़ नहीं…
क्यों हम एक-दूसरे से दूर रहें

रात चाँदनी का दरया हुई
चल चाँद की कश्ती में दूर चलें

गुलाबी फूल दिलों में खिले हैं
नयी ख़ुशबू जिस्मों में घुले है
और कोई हुस्न नहीं,
शाम-सी रस्म नहीं…
हम निभाते इश्क़ के दस्तूर रहें

रात चाँदनी का दरया हुई
चल चाँद की कश्ती में दूर चलें


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

4 Comments

  1. mehek said,

    April 18, 2008 at 8:55 pm

    रात चाँदनी का दरया हुई
    चल चाँद की कश्ती में दूर चलें
    बादलों के पीछे,
    तारों की छाँव में…
    प्यार का हसीन कसूर करें

    nazar ji behtarin bhav,umada shabd,behad khubsurat nazm hai,tariff kam padh rahi hai,juth nahi bolungi.

  2. विनय प्रजापति said,

    April 19, 2008 at 7:26 am

    taareef ka sukh kitano ko milata hai, yeh to aap kii ada hai…

  3. RoNnY said,

    April 20, 2008 at 3:02 am

    Superb bro.. Kya baat hai.. sach me mast likhte ho

  4. विनय प्रजापति said,

    April 20, 2008 at 3:54 am

    Thanks RoNnY…

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