साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है

साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है
मोहब्बत मुझे मसल रही है
ख़्यालों की राह-राह जल रही है

चाँद से मुझको शिकवे बहुत हैं
आप से मेरे शादो-फ़रहत हैं
ख़ामुशी उसकी मुझे छल रही है

साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है

एजाज़े-चाँदनी बिखरा हुआ है
मुझको तस्व्वुर तेरा हुआ है
तन्हाई हर दम ख़ल रही है

साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है

सितारे अपनी पलकें झपक रहे हैं
तेरा हुस्न बेसुध तक रहें हैं
बुझी-बुझी मेरी नब्ज़ चल रही है

साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है

तुमको हर चेहरे में ढूँढ़ते हैं
बार-बार दिल के टुकड़े टूटते हैं
मंज़र यह शाम की ढल रही है

साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

4 Responses to this post.

  1. सितारे अपनी पलकें झपक रहे हैं
    तेरा हुस्न बेसुध तक रहें हैं
    बुझी-बुझी मेरी नब्ज़ चल रही है

    ——————————————–
    बहुत बढिया पंक्तियाँ
    दीपक भारतदीप

    Reply

  2. चाँद से मुझको शिकवे बहुत हैं
    आप से मेरे शादो-फ़रहत हैं
    ख़ामुशी उसकी मुझे छल रही है

    साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है

    एजाज़े-चाँदनी बिखरा हुआ है
    मुझको तस्व्वुर तेरा हुआ है
    तन्हाई हर दम ख़ल रही है

    साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है

    sahi, bahut khubsurat!

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  3. Posted by madmilker on April 13, 2008 at 7:45 PM

    Very Good, Priceless!

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