साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है
मोहब्बत मुझे मसल रही है
ख़्यालों की राह-राह जल रही है
चाँद से मुझको शिकवे बहुत हैं
आप से मेरे शादो-फ़रहत हैं
ख़ामुशी उसकी मुझे छल रही है
साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है
एजाज़े-चाँदनी बिखरा हुआ है
मुझको तस्व्वुर तेरा हुआ है
तन्हाई हर दम ख़ल रही है
साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है
सितारे अपनी पलकें झपक रहे हैं
तेरा हुस्न बेसुध तक रहें हैं
बुझी-बुझी मेरी नब्ज़ चल रही है
साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है
तुमको हर चेहरे में ढूँढ़ते हैं
बार-बार दिल के टुकड़े टूटते हैं
मंज़र यह शाम की ढल रही है
साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४




















Posted by विनय प्रजापति on April 14, 2008 at 6:58 PM
aap sabhii ka shukriya!
Posted by दीपक भारतदीप on April 14, 2008 at 5:17 PM
सितारे अपनी पलकें झपक रहे हैं
तेरा हुस्न बेसुध तक रहें हैं
बुझी-बुझी मेरी नब्ज़ चल रही है
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बहुत बढिया पंक्तियाँ
दीपक भारतदीप
Posted by mehek on April 13, 2008 at 8:55 PM
चाँद से मुझको शिकवे बहुत हैं
आप से मेरे शादो-फ़रहत हैं
ख़ामुशी उसकी मुझे छल रही है
साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है
एजाज़े-चाँदनी बिखरा हुआ है
मुझको तस्व्वुर तेरा हुआ है
तन्हाई हर दम ख़ल रही है
साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है
sahi, bahut khubsurat!
Posted by madmilker on April 13, 2008 at 7:45 PM
Very Good, Priceless!