ज़ियाँ दिल का किया जो तुमसे लगाया
तो पल-पल सीने में धड़कता क्या है?
तेरी आरज़ू मुझे कहाँ बहा ले जा रही है?
ज़ियाँ = loss
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४
Archive for April 13th, 2008
13 Apr
ज़ियाँ दिल का किया
13 Apr
साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है
साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है
मोहब्बत मुझे मसल रही है
ख़्यालों की राह-राह जल रही है
चाँद से मुझको शिकवे बहुत हैं
आप से मेरे शादो-फ़रहत हैं
ख़ामुशी उसकी मुझे छल रही है
साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है
एजाज़े-चाँदनी बिखरा हुआ है
मुझको तस्व्वुर तेरा हुआ है
तन्हाई हर दम ख़ल रही है
साँस रफ़्ता-रफ़्ता पिघल रही है
सितारे अपनी पलकें झपक रहे हैं
तेरा हुस्न बेसुध [...]




















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