तुम्हारी ख़ुशबू से महक उठा है मन
तुम्हारी ख़ुशबू से महक उठा है मन
तुम्हारे तस्व्वुर से भर आये नयन
बरखा की मखमली फुहार से जी तर है
धीरे-धीरे बुझ रही है दर्द की सूजन
लहू फिर ज़ख़्मे-जिगर से बहा है
दर्द तुम्हारा दिल में मेहमान रहा है
सर्द है बरसों से यह ख़िज़ाँ का मौसम
ज़र्द पत्तों में खो गया है कहीं गुलशन
बहार की नर्म धूप कहीं खो गयी है
मानूस वह चाँदनी किसी छत पे सो गयी है
यह उदास फ़ज़िर भी कितनी तवील है
दिखता नहीं दूर तक उफ़क़ का रोगन
तुमको पहली नज़र से चाहा दिलो-जाँ से
हर दुआ में मैंने तुमको माँगा आसमाँ से
मेरी मंज़िल मेरी मोहब्बत हो तुम
कैसे भी तुम मेरी बनो, जुड़ जाये बन्धन
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४

alpana said,
April 3, 2008 at 9:16 am
बहार की नर्म धूप कहीं खो गयी है
मानूस वह चाँदनी किसी छत पे सो गयी है”
bahut khuub likha hai!
विनय प्रजापति said,
April 12, 2008 at 8:25 pm
thankyou alpana jii….