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Apr
Posted by विनय in मेरा गीत. Tagged: धूप, इश्क़, दर्द, heart, love, eyes, mind, मौसम, दिल, प्यार, मंज़िल, ख़ुशबू, तवील, मोहब्बत, चाँदनी, pain, पत्ते, बरखा, बहार, दुआ, नज़र, winter, बन्धन, fragrance, तस्व्वुर, soul, गुलशन, आसमाँ, morning, season, fall, ज़ख़्म, sad, spring, जाँ, colour, मन, rain, sky, final destination, बरस, नयन, sight, sunlight, long, god, garden, लहू, blood, scar, prayer, ज़र्द, ख़िज़ाँ, wound, yellow, dead, उदास, leaves, dawn, relation, मानूस, known, नर्म, soft, wet, moonlight, फ़ज़िर, तर, सर्द, जी, roof, year, छत, remenisce, मखमली, cozy, फुहार, drizzle, damped, सूजन, briused, मेहमान, guest, ceiling, उफ़क़, रोगन. 2 Comments
तुम्हारी ख़ुशबू से महक उठा है मन
तुम्हारे तस्व्वुर से भर आये नयन
बरखा की मखमली फुहार से जी तर है
धीरे-धीरे बुझ रही है दर्द की सूजन
लहू फिर ज़ख़्मे-जिगर से बहा है
दर्द तुम्हारा दिल में मेहमान रहा है
सर्द है बरसों से यह ख़िज़ाँ का मौसम
ज़र्द पत्तों में खो गया है कहीं गुलशन
बहार की नर्म धूप कहीं खो गयी है
मानूस वह चाँदनी किसी छत पे सो गयी है
यह उदास फ़ज़िर भी कितनी तवील है
दिखता नहीं दूर तक उफ़क़ का रोगन
तुमको पहली नज़र से चाहा दिलो-जाँ से
हर दुआ में मैंने तुमको माँगा आसमाँ से
मेरी मंज़िल मेरी मोहब्बत हो तुम
कैसे भी तुम मेरी बनो, जुड़ जाये बन्धन
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४
Posted by विनय प्रजापति on April 12, 2008 at 8:25 PM
thankyou alpana jii….
Posted by alpana on April 3, 2008 at 9:16 AM
बहार की नर्म धूप कहीं खो गयी है
मानूस वह चाँदनी किसी छत पे सो गयी है”
bahut khuub likha hai!