उम्मीद है हम तुम मिलेंगे
उम्मीद है नये दीप जलेंगे
जब बसंत की धूप महकेगी
उम्मीद है दोनों दिल खिलेंगे
उम्मीद है ख़ुशी घर आयेगी
उम्मीद है तेरा ख़त लायेगी
जब कली से भँवरा मिलेगा
उम्मीद है ख़ुशबू बुलायेगी
उम्मीद है बादल बरसेंगे
उम्मीद है दो दिल तरसेंगे
जब रिमझिम से मन भीगेगा
उम्मीद है बदन महकेंगे
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४
Archive for March 30th, 2008
30 Mar




















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