तस्व्वुरे-हुस्नो-सादगिए-’शीना’

March 23, 2008 at 11:38 pm (मेरी नज़्म) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

सुबह-सा चेहरा, माथे पर सूरज-सी बिन्दिया
हँसी, जैसे ख़ुशबू हो कोई, गुनगुनाती हुई
आँखें साँवली-सी, कजरारी-सी
ऐसे झुकती और खुलती थीं
जैसे रात पे सुबह का दरिया बहा दिया हो
वह लट जब चेहरे पर गिरती थीं
यूँ लगता था मानो! बादल की ओट में चाँद हो

उसके पाँव की आहट जैसे बादे-सबा फूलों पर
रूप की सादगी ऐसी जैसे सूफ़ी का तस्व्वुर
रंग बिल्कुल गुले-अंदाम ज़रा-सी बनावट नहीं
लब सुर्ख़ थे ऐसे, जिस तरह गुलाब के पैमाने
ज़ुबाँ नाज़ुक मिज़ाज, वाइज़ो-नासेह की तरह
बदन शीशे जैसा, साफ़-शफ़्फ़ाक़-गुल्फ़ाम
अदा में जुज़ सादगी और कुछ नहीं झलकता था

मालूम नहीं, वह बरस ख़ाब का था कि सच था
उसका वह मेरे घर आना
काँधे से गिरते वह कमर पे दुप्पटे की गाँठ
वह दीपावली के दिए, वह सजावट सब
देखना उसे मेरा एक टुक, सुबहो-शाम, रोज़
वह तूफ़ान जी का, कुछ करके दिखा दें
लिखना तेरा नाम दरो-दर पर, आदतन

आज पाँच बरस हो गये…
I’m still reminiscing about you…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३-२००४

4 Comments

  1. mehek said,

    March 24, 2008 at 10:16 am

    देखना उसे मेरा एक टुक, सुबहो-शाम, रोज़
    वह तूफ़ान जी का, कुछ करके दिखा दें
    लिखना तेरा नाम दरो-दर पर, आदतन
    bahut sundar

  2. विनय प्रजापति said,

    March 24, 2008 at 2:24 pm

    oo! thankyou so much…, Well how’s Holi?

  3. Brijmohanshrivastava said,

    March 26, 2008 at 11:11 am

    badal ki ot ka chand;sufi ka tasabbur’; apki kalpna jise tasavur kahte hain waqai bahut dad ke qabil hai ;apne likha apko dhanyawad…

  4. विनय प्रजापति said,

    March 26, 2008 at 1:06 pm

    Waise Brij Jee, thanks! but take interest only in poetry, not in personal life… it’s request…

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