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Mar
Posted by विनय in मेरी ग़ज़ल. Tagged: अधूरा, आलेखन, ख़ाब, ख़ुशियाँ, ग़ैर, घर, झोली, ठिठोली, डोली, दर्द, मज़ा, रंग, रंगोली, लुत्फ़, संजो, होली, bag, collect, colours, delineation, design, Doli, dreams, festival of Holi, fun, happiness, Holi, home, incomplete, jokes, pain, palankeen, palanquin, Rangoli, stranger. 4 Comments
तुम नहीं तो रंग नहीं होली में
नहीं सजता आलेखन रंगोली में
है दर्द में आज भी वही मज़ा
न है लुत्फ़ ग़ैर की ठिठोली में
इसमें क्या जाता, तेरा ख़ुदाया!
जो चंद ख़ुशियाँ होतीं मेरी झोली मेँ
मैं संजो रहा हूँ इक अधूरा ख़ाब
कि तुम आती मेरे घर डोली में
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००४-२००५
Posted by विनय प्रजापति on March 22, 2008 at 11:08 AM
Thanks, MeheK… Happy Holi…
Posted by mehhekk on March 21, 2008 at 9:00 PM
bahut khub holi ki badhai.
Posted by विनय प्रजापति on March 21, 2008 at 5:08 PM
आपको एवं आपके परिवार जनों को होली के पावन अवसर पर ढेरों शुभकामनाएँ!
Posted by mahendra mishra on March 21, 2008 at 4:56 PM
वाह वाह क्या चीज है
तुम नही रंग नही
हम नही रंग नही
होली की आपको मुबारकबाद