ख़लिश को जगह न दो दिल में
नासूर बन जायेगी
मरहम भी न लगा पाओगे
साँस घुट के मर जायेगी
ज़ीस्त अलग है, ज़ीस्त जीना अलग
समझे ‘नज़र’!
मजलिस में बैठोगे वाइज़ के साथ
बाँह खुल जायेगी…
ज़ीस्त= जीवन, Life
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
18 Mar
ख़लिश को जगह न दो दिल में
नासूर बन जायेगी
मरहम भी न लगा पाओगे
साँस घुट के मर जायेगी
ज़ीस्त अलग है, ज़ीस्त जीना अलग
समझे ‘नज़र’!
मजलिस में बैठोगे वाइज़ के साथ
बाँह खुल जायेगी…
ज़ीस्त= जीवन, Life
Posted by विनय प्रजापति on March 19, 2008 at 1:08 AM
well, it was direct from heart… when I was very sad… I can’t forget that day!
Posted by mehek on March 19, 2008 at 12:37 AM
ख़लिश को जगह न दो दिल में
नासूर बन जायेगी
मरहम भी न लगा पाओगे
bahut hi sahi kaha nazar ji, nice nazm!