ख़लिश को जगह न दो दिल में

ख़लिश को जगह न दो दिल में
नासूर बन जायेगी
मरहम भी न लगा पाओगे
साँस घुट के मर जायेगी
ज़ीस्त अलग है, ज़ीस्त जीना अलग
समझे ‘नज़र’!
मजलिस में बैठोगे वाइज़ के साथ
बाँह खुल जायेगी…

ज़ीस्त= जीवन, Life


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

2 Responses to this post.

  1. well, it was direct from heart… when I was very sad… I can’t forget that day!

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  2. ख़लिश को जगह न दो दिल में
    नासूर बन जायेगी
    मरहम भी न लगा पाओगे

    bahut hi sahi kaha nazar ji, nice nazm!

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