इश्क़ क्या हमको मारेगा, हम इश्क़ को मारेंगे
अब तलक क्या हारे हैं उससे, जो अब हारेंगे
जाओ कह दो शायरे-मुक़ाबिल से हम भी मैदाँ में हैं
वह क्या कहेगा शे’र, हम ज़बाने-लहू को तराशेंगे
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
18 Mar
इश्क़ क्या हमको मारेगा, हम इश्क़ को मारेंगे
अब तलक क्या हारे हैं उससे, जो अब हारेंगे
जाओ कह दो शायरे-मुक़ाबिल से हम भी मैदाँ में हैं
वह क्या कहेगा शे’र, हम ज़बाने-लहू को तराशेंगे
Posted by Sarita on April 4, 2008 at 3:35 PM
इश्क़ क्या हमको मारेगा, हम इश्क़ को मारेंगे
अब तलक क्या हारे हैं उससे, जो अब हारेंगे
जाओ कह दो शायरे-मुक़ाबिल से हम भी मैदाँ में हैं
वह क्या कहेगा शे’र, हम ज़बाने-लहू को तराशेंगे
Cool…
Posted by Brijmohanshrivastava on March 26, 2008 at 3:13 PM
isq marta nahin jilata hai
isq harata nahi jitata hai
Posted by विनय प्रजापति on March 19, 2008 at 1:06 AM
shukriya!
Posted by mehek on March 19, 2008 at 12:40 AM
जाओ कह दो शायरे-मुक़ाबिल से हम भी मैदाँ में हैं
वह क्या कहेगा शे’र, हम ज़बाने-लहू को तराशेंगे
aafarin,wah tuk bandi ho to aise,ishq se hi lad baithe,awesome.