सिफ़र को टोह लेते हैं दिले-यार में
अपनी भी दीवानगी कुछ कम नहीं
मैं और वह, दोनों कभी दोस्त थे!
सिफ़र= शून्य, zero
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
Archive for March 18th, 2008
18 Mar
सिफ़र को टोह लेते हैं दिले-यार में
18 Mar
ख़लिश को जगह न दो दिल में
ख़लिश को जगह न दो दिल में
नासूर बन जायेगी
मरहम भी न लगा पाओगे
साँस घुट के मर जायेगी
ज़ीस्त अलग है, ज़ीस्त जीना अलग
समझे ‘नज़र’!
मजलिस में बैठोगे वाइज़ के साथ
बाँह खुल जायेगी…
ज़ीस्त= जीवन, Life
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
18 Mar
आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
चाँदनी छलकाता है तुम्हारा जिस्म सुनहरा
क्योंकर प्यार न आये नरगिसी आँखों पर
क्योंकर गुल न महकाये बहार शाखों पर
इस दीवाने को दीवानगी सिखायी किसने
दिल में उसके यह आग लगायी जिसने
आफ़ताबी मुस्कुराहट है माहताबी चेहरा
चाँदनी छलकाता है तुम्हारा जिस्म सुनहरा
किस क़ातिल अदा से तुमने तीर चलाया है
अपनी नज़रों से मेरा जिस्म महकाया है
क्योंकर [...]
18 Mar
कैसी फ़रियाद कैसा नाला
कैसी फ़रियाद, कैसा नाला
हम क़ैसो-फ़रहाद नहीं
हम हैं ख़ुदा से, ख़ुदा हमसे
सिवाय इसके कुछ याद नहीं
शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००३
18 Mar
इश्क़ क्या हमको मारेगा
इश्क़ क्या हमको मारेगा, हम इश्क़ को मारेंगे
अब तलक क्या हारे हैं उससे, जो अब हारेंगे
जाओ कह दो शायरे-मुक़ाबिल से हम भी मैदाँ में हैं
वह क्या कहेगा शे’र, हम ज़बाने-लहू को तराशेंगे
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३




















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