निख्खा शक्कर है उससे मरासिम में

March 17, 2008 at 8:29 pm (मेरी त्रिवेणी) (, , , , , , , , , , , , , , , )

निख्खा शक्कर है उससे मरासिम में
ज़्यादा को इक रोज़ ज़हर होना था

अब तू ही बता, मैं तुझसे जुदा किधर जाऊँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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