ज़ख़्मे-जिगर भर आये, कहाँ हो तुम?
बदरा सावन बुलाये, कहाँ हो तुम?
अपने हश्र तक पहुँचा ‘नज़र’ आज
मौत यह मुझको सताये, कहाँ हो तुम?
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
16 Mar
Posted by विनय in रुबाइयाँ. Tagged: इश्क़, जिगर, नज़र, प्यार, बदरा, बिछोह, मोहब्बत, मौत, सावन, हश्र, ज़ख़्म, climax, cloud, courage, death, fate, heart, love, nazar, rain, scar, separation, wound. Leave a Comment
ज़ख़्मे-जिगर भर आये, कहाँ हो तुम?
बदरा सावन बुलाये, कहाँ हो तुम?
अपने हश्र तक पहुँचा ‘नज़र’ आज
मौत यह मुझको सताये, कहाँ हो तुम?
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