Archive for March 16th, 2008

ज़ख़्मे-जिगर भर आये, कहाँ हो तुम?

ज़ख़्मे-जिगर भर आये, कहाँ हो तुम?
बदरा सावन बुलाये, कहाँ हो तुम?
अपने हश्र तक पहुँचा ‘नज़र’ आज
मौत यह मुझको सताये, कहाँ हो तुम?
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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ख़ुशबू तेरी मेरे बदन से जाती नहीं

ख़ुशबू तेरी मेरे बदन से जाती नहीं
पैग़ामे-मोहब्बत चिठ्ठियाँ लाती नहीं
तुम क्या जानो बेक़रारी मेरी प्यार में
तुमसे जुड़ी कोई बात भूली जाती नही
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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ख़राश ज़ख़्म बनेगी, घाव करेगी

ख़राश ज़ख़्म बनेगी, घाव करेगी
और मवाद के दरिये बहेंगे
हमने हमेशा ‘वफ़ा’ से लाग रखा
एक दिन सबके नज़रिये कहेंगे
शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००३

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