उम्मीद जागी है इक बार फिर तुम्हें पाने की

March 15, 2008 at 9:43 am (फुटकर कलाम) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

उम्मीद जागी है इक बार फिर तुम्हें पाने की
बचाये ख़ुदा! नज़र न लग जाये ज़माने की

तेरी जुस्त-जू को न मिटा सका कोई वक़्त-रू
दिल में एक हसरत है सो तुम्हें पाने की

वक़्त-रू= समय का चेहरा, face of time


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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