सदियाँ कटता रहूँगा

सदियाँ कटता रहूँगा
वक़्त गुज़ारता रहूँगा
तुम जो हँसते रहो
मैं भी हँसता रहूँगा..


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

One Response to this post.

  1. Posted by Brijmohan shrivastava on March 31, 2008 at 12:16 PM

    मैं हँसता रहूँगा और तुम्हे हँसाता रहूँगा…

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