कभी यूँ भी होता है ज़िन्दगी मिलती है खो जाती है
यह शाम उसकी यादों में मुझको डुबो जाती है
नहीं यह मुमकिन वह मिल जाये जिसे तुम चाहो
यह मोहब्बत चंद लोगों के दामन भिगो जाती है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ११ अगस्त २००४
15 Mar
कभी यूँ भी होता है ज़िन्दगी मिलती है खो जाती है
यह शाम उसकी यादों में मुझको डुबो जाती है
नहीं यह मुमकिन वह मिल जाये जिसे तुम चाहो
यह मोहब्बत चंद लोगों के दामन भिगो जाती है
Posted by विनय प्रजापति on March 17, 2008 at 4:52 PM
thanks for compliment!
Posted by mehhekk on March 17, 2008 at 10:31 AM
kya baat hai, wah khub!