कभी यूँ भी होता है

कभी यूँ भी होता है ज़िन्दगी मिलती है खो जाती है
यह शाम उसकी यादों में मुझको डुबो जाती है

नहीं यह मुमकिन वह मिल जाये जिसे तुम चाहो
यह मोहब्बत चंद लोगों के दामन भिगो जाती है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ११ अगस्त २००४

2 Responses to this post.

  1. Posted by mehhekk on March 17, 2008 at 10:31 AM

    kya baat hai, wah khub!

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