कभी यूँ भी होता है

March 15, 2008 at 9:33 am (फुटकर कलाम) (, , , , , , , , , , , , , )

कभी यूँ भी होता है ज़िन्दगी मिलती है खो जाती है
यह शाम उसकी यादों में मुझको डुबो जाती है

नहीं यह मुमकिन वह मिल जाये जिसे तुम चाहो
यह मोहब्बत चंद लोगों के दामन भिगो जाती है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ११ अगस्त २००४

2 Comments

  1. mehhekk said,

    March 17, 2008 at 10:31 am

    kya baat hai, wah khub!

  2. विनय प्रजापति said,

    March 17, 2008 at 4:52 pm

    thanks for compliment!

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