हमारी दोस्ती बहुत गहरी थी

March 15, 2008 at 8:58 am (फुटकर कलाम) (, , , , , , , , , , )

हमारी दोस्ती बहुत गहरी थी
जिसको लोहा कहा गया था
मगर जब उतरे बर्ग़े-बहार
दोस्ताना मोर्चा खा गया था

बर्ग़े-बहार= बहार के पत्ते, मोर्चा= जंग, rust


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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