नग़मे खिलने लगे हैं

March 14, 2008 at 8:02 pm (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

नग़मे खिलने लगे हैं नज़्म महकने लगी है
तेरे एहसास पे धड़कन ग़ज़ल कहने लगी है
साँवली आँखों में सपनों की ख़ुशबू घुलने लगी है
मुसलसल ख़ाबों की भीड़ पलकों में लगने लगी है

बंजर सूखे मैदान सारे सब्ज़ होने लग गये
फूल अरमानों के मेरे मन में खिलने लग गये
सौंधे आसमाँ पर सतरंगी धनुष खिल गया है
पर्वतों पे घटा झुकने लगी है बरसने लगी है

नग़मे खिलने लगे हैं नज़्म महकने लगी है
तेरे एहसास पे धड़कन ग़ज़ल कहने लगी है

दुआओं की सदा मेरी फ़ुग़ाँ असर कर जायेगी
रहमत ख़ुदा की होगी मेरी ज़ीस्त घर आयेगी
बहारो-फ़िज़ा का रंग हर-सू बदलने लगा है
तेरे तस्व्वुर की मद्धम धूप खिलने लगी है

साँवली आँखों में सपनों की ख़ुशबू घुलने लगी है
मुसलसल ख़ाबों की भीड़ पलकों में लगने लगी है

मुसलसल= लगातार, ज़ीस्त= जीवन, हर-सू= चारों तरफ़


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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