मैं आँखों के लिए ख़ाब खरीदने निकला
मैं आँखों के लिए ख़ाब खरीदने निकला
सितारों के लिए चाँद ढूँढ़ने निकला
दिन अदा किया तब रात नसीब हुई
हर सहर पे रात बेचने निकला
सुरमई अँखियों वाली जब याद आयी
मैं आँसुओं से फ़रियाद सींचने निकला
तकिए पे इक ख़ाब का जो तिनका मिला
‘नज़र’ बुझती बात कुरेदने निकला
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
Brijmohanshrivastava said,
March 26, 2008 at 2:47 pm
true explaination of pain!